आरक्षण और मेधा

                                                              

                                                                                 भाग १: योग्यता का संघर्ष

दहक रही है आज चेतना,

न्याय-पथों की खोज में।

कब तक मेधा बलि चढ़ेगी,

राजनीति के मौज में?


अंक-तालिका रोती देखी,

श्रम का पानी बहता देखा।

मेहनत का प्रतिफल माटी में,

हर छात्र यहाँ पर सहता देखा।


एक ही कक्षा, एक ही शिक्षक,

एक ही पुस्तक, एक ही ज्ञान।

फिर क्यों अंकों के पीछे ही,

बाँट दिया जाता इंसान?


दिन-रात जलाकर दीप जहाँ,

छात्रों ने सपने बोए थे।

उस योग्यता की वेदी पर,

अरमान अकेले रोए थे।


नब्बे प्रतिशत पाकर भी जो,

पंक्ति में पीछे खड़ा रहा।

कम अंकों वाला आगे निकला,

यह कैसा नियम यहाँ गढ़ा?


भाग २: सत्तर सालों की कथा


सत्तर बरसों का समय मिला,

उत्थान का वादा किया गया।

पर समता लाने के नाम पर,

भेदभाव ही जिया गया।


जो सुविधा दी थी थोड़े दिन को,

वो स्थायी बाज़ार बनी।

सत्ता की इस खींचातानी में,

योग्यता ही लाचार बनी।


क्या प्रतिभा की कोई जाति,

या ज्ञान का कोई धर्म नहीं?

क्या परिश्रम की कोई सीमा,

या स्वार्थ का कोई अंत नहीं?


जिस व्यवस्था को बनना था,

सच्चे समरसता का आधार।

वही व्यवस्था बन बैठी है,

प्रतिभा का गहरा आघात।


योग्यता की छाती पर अब,

विभाजन के शूल गड़े।

जहाँ पसीना बहा एक सा,

वहाँ भेद के वृक्ष खड़े।


भाग ३: संपन्नता और छल


आठ लाख की छतरी नीचे,

कैसा यह 'निर्धन' मुस्काता?

साधनों से जो संपन्न खड़ा,

वो ही सारा हक खा जाता!


अधिकारी का पुत्र भी शोषित,

कैसा यह विचित्र विधान?

सच्चा निर्धन खड़ा द्वार पर,

माँग रहा जीवन का दान!


गाड़ी, बंगले, ऊँचे पद भी,

फिर भी लाभ की चाहत है।

सच्चे पीड़ित के हिस्से पर,

स्वार्थी मन को राहत है।


साधनों की छाँव में बैठे,

जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी भोग करें।

अंतिम जन का हक़ छीनकर,

वे ही शोषित का सांग धरें!


एक वर्ग जो समृद्ध हुआ,

वो लाभ छोड़ना चाहता नहीं।

अपने ही भाई-बंधुओं का,

उद्धार देखना चाहता नहीं।


भाग ४: मेधा का पलायन


जिस देश की मिट्टी में जन्मे,

वहाँ अवसर से वंचित हैं।

परदेश में जाकर चमके जो,

स्वदेश में क्यों वे लांछित हैं?


प्रतिभा अब तो छोड़ रही है,

अपनी माटी, अपना घर।

विदेशों की राह पकड़ती,

बेबसी का ले चादर।


'ब्रेन ड्रेन' का यह कैसा दंश,

जो राष्ट्र को अंदर तोड़ रहा?

योग्यता को ठुकराकर यह तंत्र,

विकास की दिशा को मोड़ रहा।


डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक,

जब योग्यता से दूर हुए।

तंत्र की इस विफलता पर,

प्रतिभाशाली मजबूर हुए।


कब तक मेधा सहती रहेगी,

इस व्यवस्था का यह प्रहार?

कब तक काबिलियत रोएगी,

माँगती हुई अपना अधिकार?


भाग ५: राजनीति का खेल


राजनीति के चतुर खिलाड़ी,

खेल रहे वोटों का खेल।

प्रतिभा को निर्वासित करके,

रचते हैं सत्ता का मेल।


चुनाव आते ही खिल जाते,

जाति-पाँति के ये बाज़ार।

नेता अपनी रोटी सेकें,

जनता सहे दुखों का भार।


अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक,

सबको बाँटा खंड-खंड।

समानता का नारा देकर,

चला रहे यह ढोंग प्रचंड।


आश्वासन के मीठे विष से,

कब तक मन को बहलाओगे?

सच्चे निर्धन को भूखा रख,

किसको महल दिलाओगे?


खोखले नारों के पीछे,

सच का सूरज डूब रहा।

राजनीति के इस दलदल में,

देश का भावी रूप ढहा।


भाग ६: दोहरे रवैये पर प्रहार


जो खुद को निष्पक्ष बताते,

वे भी चुप्पी साधे हैं।

स्वार्थ जहाँ पर सिद्ध हुआ,

वहाँ नियम ही आधे हैं।


जहाँ अपना लाभ दिखाई दे,

वहाँ व्यवस्था सही लगे।

और जहाँ हो दूसरे का हक,

वहाँ नीति ही बुरी लगे।


यह कैसा दोहरा चरित्र है,

कैसी यह लाचारी है?

देश-हित को भूल चुके सब,

अपनी-अपनी बारी है।


कागज़ के इन प्रमाण-पत्रों पर,

भविष्य लिखा जा रहा यहाँ।

ज्ञान और मेधा का आदर,

खो गया है न जाने कहाँ।


शरीर, रक्त और क्षमता एक,

फिर क्यों भेद का छाया अंधेरा?

मेहनत में जब कमी नहीं,

तो क्यों छिनता अधिकार मेरा?


भाग ७: समाधान और हुंकार


छूट मिले तो केवल उसको,

जो अभाव में जीता हो।

अंतिम पंक्ति में खड़ा हुआ,

जो विष विषमता का पीता हो।


दो लाख से कम जिसकी आय,

चाहे वो किसी भी द्वार का हो।

अन्न, ज्ञान और अवसर पर,

बस ऐसे निर्धन का अधिकार हो!


जाति, धर्म और पंथ हटाओ,

केवल 'अभाव' को पहचानो।

आर्थिक आधार ही बने कसौटी,

सच्चा धर्म इसी को मानो।


एक देश हो, एक परीक्षा,

एक ही हो प्रवेश-नियम।

जहाँ योग्यता ही सर्वोपरि हो,

लागू हो ऐसा उत्तम नियम।


एक फ़ीस, एक ही मापदंड,

हर विद्या-मंदिर, रोज़गार में।

प्रतिभा ही केवल मूल्य बने,

इस भारत के बाज़ार में।


तोड़ो यह दोहरी परिपाटी,

निष्पक्ष नया विधान रचो।

जहाँ श्रम ही केवल पूजा हो,

ज्ञान से ही अब प्राण बचो।


जागो ओ भारत के कण-कण,

अब निष्प्राण तंत्र को ललकारो।

राजनीति की इस बिसात पर,

स्वयं को मत मोहरा मानो।


आओ मिलकर अलख जगाएँ,

सच्ची समता का कल लाएँ।

जहाँ योग्यता ही राजा हो,

नव-भारत का ऐसा सृजन कराएँ!


©®Dr.RavindraKumar








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