एहसास: “खुद से खुद तक”

                                                                              एहसास: “खुद से खुद तक”


कभी-कभी लगता है

कि मैं खुद को अभी तक

पूरा जान ही नहीं पाया हूँ।

जैसे मैं एक किताब हूँ

जिसके कुछ पन्ने

अभी भी अपनी स्याही का इंतज़ार कर रहे हैं।


मैं रोज़ एक छोटी-सी बात सीखता हूँ

कभी अपनी आदतों से,

कभी अपनी भूलों से,

कभी उन सवालों से

जो किसी और ने नहीं,

मेरे दिन ने मुझसे पूछे होते हैं।


खुद को सीखना

किसी लक्ष्य की तरह नहीं होता

ये एक यात्रा की तरह है,

जिसमें हर मोड़ पर

आप अपने ही किसी नए चेहरे से मिलते हैं।


कभी मैं अपने गुस्से को समझता हूँ

तो पता चलता है

कि वह गुस्सा नहीं,

मेरी थकान बोल रही थी।

कभी मैं अपनी चुप्पी को पकड़ता हूँ

तो पता चलता है

कि मैं शांत नहीं,

बस शब्दों के बोझ से थोड़ा दूर बैठा था।


मैं रोज़ खुद को पढ़ने की कोशिश करता हूँ

बिना किसी आलोचना के,

बिना किसी जल्दबाज़ी के।

क्योंकि आत्मा भी धीरे-धीरे खुलती है,

जैसे बारिश में भीगा कोई फूल

जिसकी पंखुड़ियाँ

एक-एक करके खुलती चली जाती हैं।


कभी भीतर से आवाज़ आती है

“तू कब सीखेगा अपने आप को माफ़ करना?”

मैं मुस्कुराता हूँ—

क्योंकि आत्म-क्षमा

शायद सबसे कठिन पाठ है,

और मैं अभी भी उसका पहला पन्ना पढ़ रहा हूँ।


मैंने जाना है

कि पूरी दुनिया समझ ले

ये इतना जरूरी नहीं,

पर खुद को समझना

जीवन का सबसे गहरा सुख है।


कभी मैं खुद को देखकर

हैरान होता हूँ

कि मैं कितना बदल गया हूँ

बिना शोर किए, बिना घोषणा किए,

जैसे कोई नदी

अपने रास्ते बदलते-बदलते

एक नई दिशा सीख जाती है।


और आज

मैंने खुद से सिर्फ इतना कहा—

“मैं तुझे पूरा नहीं समझ पाया हूँ,

पर कोशिश रोज़ करूँगा।”


क्योंकि खुद को सीखना

एक दिन का काम नहीं,

ये जीवनभर की सुंदर यात्रा है

जिसमें हर मोड़ पर

हम थोड़ा-सा टूटते हैं, थोड़ा-सा बनते हैं,

और थोड़े-से और अपने हो जाते हैं।

-RavindraGangwar







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