“सपनों की आवाज़”


“सपनों की आवाज़”


जब भी मैं 

सुकून की चाह में 

जीवन जीने की 

अपनी रफ़्तार थोड़ी कम करता हूँ,

कोई पुराना सा सपना

धीरे से मेरे पास आकर बैठ जाता है।

वह कुछ नहीं कहता

बस मेरी हथेली पर

अपने अधूरेपन की गर्माहट रख देता है।


अजीब है,

हम सपनों को कभी सच होने की जल्दी में

इतना धकेल देते हैं

कि उनकी नर्म साँसें भी टूटने लगती हैं।


आज सुबह

मैंने उस सपने के सिर पर हाथ फेरा

वह पहली बार मुस्कुराया।

उसने कहा,

“मैं पूरा होना चाहूँगा…

पर तेरी रफ़्तार के साथ,

तेरी साँसों की चाल के साथ,

तेरी धड़कनों की भाषा में।”


मैंने महसूस किया,

कि हर सपना चिल्लाकर नहीं बोलता,

कुछ फुसफुसाहट में ही

अपनी दुनिया को पूरा कर देते हैं।


मैंने उससे पूछा

“क्यों लौट आते हो बार-बार?”

वह बोला—

“क्योंकि तू मुझे छोड़ नहीं पाया,

बस थोड़ी देर के लिए

किसी मोड़ पर रुककर

खुद को संभाला था।”


उसने मेरी आँखों की थकान पढ़ ली,

और बोला

“सपने बोझ नहीं होते,

बस समय माँगते हैं

और तूने ख़ुद को इतना खो दिया

कि मुझे जगह ही कहाँ मिलती?”


मैं चुप हो गया।

उस मौन में एक सच चमक रहा था

कि रास्ते खत्म नहीं होते,

हम ही कहीं जल्दी में

अपना ही मोड़ चूक जाते हैं।


फिर मैंने उस सपने को

अपने पास बैठने दिया।

उसकी मौजूदगी ने

मेरे कमरे की हवा बदल दी

जैसे कोई नया मौसम

धीरे-धीरे खिड़की पर उतर रहा हो।


और तब जाना

सपना पूरा हो या न हो,

उसका होना ही

दिल की सबसे सच्ची रोशनी है।


आज मैंने उसे कहा

“चल, धीरे-धीरे कोशिश करते हैं।”

और पहली बार

सपना मुस्कुरा कर बोला—

“यही तो पर्याप्त है।”

RavindraGangwar 




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