“विचारों का आसमान”
कभी-कभी
मेरे मन के अंदर
एक बिल्कुल अनजान सा आसमान खुल जाता है।
न उसमें बादल होते हैं,
न कोई मौसम
बस विचारों की हल्की-हल्की धाराएँ
जिन्हें देखकर लगता है
जैसे नई दुनिया बन रही हो।
मैं उन धाराओं के करीब जाता हूँ
तो लगता है
हर विचार एक चिड़िया है,
जिसे मैंने कभी जाने-अनजाने
अपने अंदर पाल लिया था।
कुछ विचार तेज़ उड़ते हैं,
जैसे किसी खोज की भूख लिए हुए,
और कुछ धीरे तैरते हैं
जैसे उन्हें दुनिया की जल्दी नहीं।
कभी-कभी
कोई विचार अचानक चमक उठता है,
जैसे रात के आकाश में
तारों की कोई नयी कतार उभर आए।
मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ
पर वो कहता है,
“अगर तू जल्दी करेगा
तो मैं अपनी चमक खो दूँगा।”
तब समझ आता है
कि रचनात्मकता, किसी शोर में नहीं,
किसी दबाव में नहीं,
बल्कि उस निस्पंद क्षण में खिलती है
जब मन दुनिया की नहीं,
अपनी भाषा सुनता है।
मैं कभी-कभी
अपनी आँखें बंद करता हूँ
और देखता हूँ
कि विचार एक नदी की तरह
मेरे भीतर बह रहे हैं
हर मोड़ पर
एक नया रंग,
एक नई सम्भावना,
एक नया अंदाज़ लिए हुए।
उनके साथ बहने में
कोई डर नहीं होता,
क्योंकि यह यात्रा
मंज़िल खोजने की नहीं,
खुद को अनजाने रूपों में
पुनः गढ़ने की होती है।
मैंने सीखा है
कल्पना का आसमान
सीखने से नहीं,
छोड़ देने से खुलता है।
जो पकड़ा जाता है
वो विचार नहीं,
बस उसका खोल होता है
सच्चे विचार तो
उड़ान में ही मिलते हैं।
और जब मैं
अपनी नोटबुक बंद करता हूँ,
तो महसूस करता हूँ
कि मैं कुछ नहीं लिख पाया
पर मैं बहुत कुछ लिखने लायक
ज़रूर बन गया हूँ।
क्योंकि सच यही है
विचारों का आसमान
दिखने की चीज़ नहीं,
खुलने की चीज़ है।
और जब वह खुलता है,
तो हम खुद को
उसी से बड़ा
और उसी से नया
पाते हैं।
-RavindraGangwar


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