“छोटे पलों का जादू”
रोज़मर्रा की इस भागती दुनिया में
अक्सर हम बड़े सपनों के पीछे
इतना तेज़ भागते हैं
कि छोटे-छोटे सुख
चुपचाप कोने में बैठकर
हमारी तरफ़ मुस्कराते हुए
देखते रह जाते हैं।
सुबह की पहली चाय
भले ही थोड़ी कम-शक्कर की हो,
पर उसके साथ मिलने वाला
वो सुकून
हमेशा ठीक-ठीक मात्रा में
मिल ही जाता है।
कप से उठती भाप
जैसे चेहरा छूकर कहती हो—
“आज भी तुम्हारा दिन अच्छा ही जाएगा।”
और फिर वो चाय की पहली चुस्की
इतनी सुकून भरी लगती है
कि लगता है
दुनिया की सारी टेंशन
भाप बनकर उड़ गई।
कभी-कभी रास्ते में
एक बिल्कुल अनजान इंसान का
हल्का-सा मुस्कराकर गुजर जाना
इतना असर छोड़ जाता है
कि लगता है
शायद दुनिया उतनी कठोर नहीं
जितना हम मानते रहते हैं।
गर्मियों के बीच दोपहर में
जब बिजली चली जाती है
और हम छत पर बैठकर
हल्की-सी हवा का इंतज़ार करते हैं,
तब एक छोटा-सा झोंका भी
पूरे दिन की थकान धो देता है।
मानो हवा कह रही हो
“मैं कम हूँ, पर जितनी हूँ
उतनी तुम्हारे लिए काफ़ी हूँ।”
बरसात में
पहली बूंद ज़मीन पर गिरती है
और मिट्टी की खुशबू उठती है
तो एक पल के लिए
हम सब बच्चे बन जाते हैं,
नए जूते गंदे करने की चिंता
दो मिनट के लिए भूलकर
बस उस ख़ुशबू का आनंद लेते हैं।
कभी किसी पुराने बैग की जेब में
अचानक से मिली कोई पुरानी टिकट,
किसी दोस्त का लिखा कागज़,
या एक भूला हुआ सिक्का
दिल को ऐसे छू जाता है
जैसे वक़्त ने खुद
कंधे पर हाथ रखकर कहा हो
“देखा, मैं बुरा नहीं हूँ,
कभी-कभी तुम्हें मुस्कुराने भी देता हूँ।”
और रात में
जब पूरा शहर सो चुका होता है
और सिर्फ़ पंखे की आवाज़
कमरे में धीरे-धीरे घूमती रहती है,
तब एहसास होता है
कि शांति भी संगीत बन सकती हैं
अगर हम उन्हें सुनना सीख जाएँ।
हम जितना बड़े हुए
उतना समझ आया
ज़िंदगी कोई विशाल पटाखा नहीं
जो एक बार में चमक जाए।
वो हज़ारों नन्ही-नन्ही रोशनियों से
धीरे-धीरे जगमगाती रहती है।
शायद असली खुशी
हमेशा बड़ी नहीं होती
वो बस इतनी होती है
कि एक साँस गहरी ले ली जाए,
एक पल ठहरकर देखा जाए,
और मन अपनी ही थकान से
थोड़ा-सा हल्का हो जाए।
-RavindraGangwar


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