“एक कप चाय”
कभी-कभी मैं
अपने कमरे में
कोने पर एक मेज लगाता हूँ
छोटी सी, साधारण,
पर उसके ऊपर
दुनिया जितनी जगह रख देता हूँ।
उस मेज पर एक कप चाय का होता है,
जिसकी भाप में
मेरे दिन के सारे तर्क
धीरे-धीरे पिघलने लगते हैं।
एकांत वहाँ मौजूद होता है
पर किसी भारी परछाईं की तरह नहीं,
बल्कि एक समझदार दोस्त की तरह,
जो बिना पूछे समझ लेता है
कि आज मुझे शब्दों की नहीं,
बस एक लंबी साँस की ज़रूरत है
कि मुझे अब राहत की जरूरत है।
मैं चाय को थामकर सोचता हूँ
ज़िंदगी कितनी जल्दी दौड़ती है,
जैसे कुछ छूट रहा हो पीछे
गुजरते वक्त के साथ
और हम कितनी देर से
खुद को थामने की कोशिश में हैं।
एकांत कहता है
“भागने की जल्दी क्यों?
थोड़ा रुककर देख,
तेरी परछाईं भी आजकल
तेरे पीछे भागते-भागते थक गई है
जैसे तू थकता है हर रोज
कुछ कर गुजर जाने की उम्मीद में ।"
मैं हँस देता हूँ
कभी-कभी सच इतनी प्यारी भाषा में
हमसे बात करता है
कि हम उसे स्वीकार करने लगते हैं।
चाय की गर्माहट
धीरे-धीरे हथेलियों से
दिल के अंदर तक उतरती है,
और लगता है
जैसे कोई भीतर रखी
पुरानी खिड़की
दोबारा खुल रही हो।
बाहर की दुनिया
अपनी गति में घूमती रहती है
लेकिन इस छोटे से क्षण में
मैं दुनिया का केंद्र नहीं,
बल्कि उसका शांत दर्शक बन जाता हूँ।
एकांत इतना बुरा नहीं होता
वह हमें छोटा नहीं करता,
वह भीतर की जगहें
बड़ी कर देता है।
वह सिखाता है
कि शोर में सुने जाने से ज़्यादा
खामोशी में समझे जाना ज़रूरी है।
और जब चाय का कप
धीरे-धीरे खाली हो जाता है,
मैं महसूस करता हूँ
कि मैं भी थोड़ा खाली होकर,
थोड़ा भर गया हूँ।
मेरी मेज वही है,
कमरा वही,
दुनिया वही
पर मैं आज
थोड़ा सा और
अपने जैसा हो गया हूँ।



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