“मन या पगडंडी ?”
कभी-कभी मन के भीतर
एक हल्की-सी पगडंडी उभर आती है,
जैसे कोई पुराना रास्ता
कई साल बाद
खुद को याद दिलाने आया हो।
मैं उस पगडंडी के पास खड़ा रहता हूँ
वहाँ कोई मंज़िल का बोर्ड नहीं,
कोई दिशा का तीर नहीं,
बस मिट्टी की एक सरल-सी सुगंध होती है
जो मुझे धीरे से खींच लेती है।
मैंने सोचा
क्यों न आज उसी पर चला जाए?
ना किसी को बताने के लिए,
ना किसी से छुपाने के लिए,
बस अपने भीतर के शांत हिस्से से
थोड़ी देर मिलने के लिए।
जैसे ही मैं आगे बढ़ा,
पेड़ों की छाया ने
मेरी धड़कनों को अपने सामंजस्य में लिया,
और हवा ने
मेरे कंधों पर जमी सारी बेचैनी
धीरे-धीरे साफ़ कर दी।
कितना अजीब है
हम बाहर की दुनिया के शोर में
इतना उलझ जाते हैं
कि अंदर की खामोशियाँ
कभी सुनाई ही नहीं दे पाती।
उस छोटे से रास्ते पर चलते-चलते
मुझे लगा
जैसे मेरा मन
अपने ही बोझ को उतार रहा हो,
जैसे कोई बच्चा
अपने घर के आँगन में लोटकर
फिर से नंगे पैर दौड़ रहा हो।
वहाँ कोई कविता नहीं थी,
कोई संवाद नहीं
बस हवा का एक वादा था
कि अगर मैं रोज़
थोड़ा सा यहाँ ठहरूँ,
तो ज़िंदगी मुझे
धीमेपन का अर्थ सिखा देगी।
मैंने अपनी आँखें बंद कीं
और भीतर एक शांत प्रकाश देखा
जो कहीं बाहर से नहीं,
मेरे ही भीतर से उठ रहा था।
और तभी समझ आया
कि शांति हमें मिलती नहीं,
हमें खोजनी पड़ती है
अपने अन्दर झांक कर
मन को टटोल कर
खुद को वक्त देकर
तराशकर
जिंदगी हमें मौके देती है
और हम समय देते हैं।
उस सुकून को , शान्ति को
अपने अन्दर बनाये रखने के लिए
ना कि छीनकर कैद करने के लिए।
मैं वापस लौटा
तो कुछ बदला नहीं था
पर मैं बदल चुका था।
मन हल्का, साँसें गहरी,
और एक नया सुकून
मेरी हथेली में सिमटा हुआ।
और फिर आज मैंने ये जाना
कि "कभी-कभी सबसे लंबी यात्रा
अपने भीतर की
सबसे छोटी पगडंडी पर होती है।"
- RavindraGangwar



Comments
Post a Comment